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2016


 पूजा में कुश का उपयोग क्यों होता है ( Why should we use kusa in puja )

हिंदू धर्म में किए जाने वाले धार्मिक कर्म-कांडों में विशेष अवसरों पर कुश ( एक विशेष प्रकार की घास) का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा कोई भी जप कुश के आसन पर बैठकर करने का ही विधान है। पर क्या आपको पता है कुश  का उपयोग पूजा क्यों किया जाता है |

धार्मिक कारण

हम  पूजा पाठ,जप,यज्ञ आदि में बैठने के लिए कुश का इस्तेमाल करते हैं !कुश की अंगुठी बनाकर अनामिका उंगली मे पहनने का विधान है, ताकि हाथ में संचित आध्यात्मिक शक्ति पुंज दूसरी उंगलियों में न जाए, क्योंकि अनामिका के मूल में सूर्य का स्थान होने के कारण यह सूर्य की उंगली है। सूर्य से हमें जीवनी शक्ति, तेज और यश मिलता है। दूसरा कारण इस ऊर्जा को पृथ्वी में जाने से रोकता है।

सर्व कष्ट निवारण मंत्र  बगलामलामन्त्र

माँ बगला का यह मला मंत्र काफी लाभदयक है, इस मंत्र को सर्व कष्ट निवारण मंत्र भी कहा जाता है |
आप इस मंत्र का जप समस्त बाधाओं को दूर करने के लिए, आपत्ति में, भय निवारण के लिए, ऊपरी दोष दूर करने के लिए ,रोग निवारण के लिए कर सकते है |

Mantra In Hindi 

ॐ नमो भगवती ॐ नमो वीर प्रताप विजय भगवति बगलामुखि मम सर्व निन्दकानां सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय-स्तम्भय ब्राह्मीं मुद्रय-मुद्रय, बुद्धिं विनाशय-विनाशय, अपरबुद्धिं कुरू-कुरू, आत्मविरोधिनां शत्रुणां शिरो-ललाट-मुख-नेत्र-कर्ण-नासिकोरू-पद-अणुरेशु-दन्तोष्ठ-जिह्वां-तालु- गुह्य-गुद-कटि-जानू-सर्वांगेषु-

शिव ताण्डव स्तोत्र (संस्कृत:शिवताण्डवस्तोत्रम्) महान विद्वान एवं परम शिवभक्त लंकाधिपति रावण द्वारा विरचित भगवान शिव का स्तोत्र है।
SHIV TANDAV STOTRA


कथा
मान्यता है कि रावण ने कैलाश पर्वत ही उठा लिया था और जब पूरे पर्वत को ही लंका ले चलने को उद्यत हुआ उस समय अपनी शक्ति पर पूर्ण अहंकार भाव में था | भोलेबाबा को उसका यह अहं पसंद नही आया तो भोले बाबा ने अपने अंगूठे से तनिक सा जो दबाया तो कैलाश फिर जहां था वहीं अवस्थित हो गया। शिव के अनन्य भक्त रावण का हाथ दब गया और वह आर्तनाद कर उठा - "शंकर शंकर" - अर्थात क्षमा करिए, क्षमा करिए और स्तुति करने लग गया; जो कालांतर में  शिव तांडव स्त्रोत्र कहलाया।
इस स्त्रोत की भाषा अनुपम और जटिल है , पर महाविद्वान रावण में इसे कुछ पलो में ही बना दिया था | शिव स्तुति और प्रसन्नता में यह स्त्रोत राम बाण है |

काव्य शैली
शिवताण्डव स्तोत्र स्तोत्रकाव्य में अत्यन्त लोकप्रिय है। यह पञ्चचामर छन्द में आबद्ध है। इसकी अनुप्रास और समास बहुल भाषा संगीतमय ध्वनि और प्रवाह के कारण शिवभक्तों में प्रचलित है। सुन्दर भाषा एवं काव्य-शैली के कारण यह स्तोत्रों विशेषकर शिवस्तोत्रों में विशिष्ट स्थान रखता है। 
कहते हैं इस स्‍तोत्र को सुनने मात्र से सकल समृद्धि, सिद्धि और संतति का वरदान प्राप्‍त हो जाता है। मूल संस्‍कृत भाषा में लिखे इस स्‍तोत्र को आइए हिन्‍दी भाषा में समझते हैं।
शिव तांडव स्‍त्रोत

जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डमनिनादवड्डमर्वयं
चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥1॥

सघन जटामंडल रूप वन से प्रवाहित होकर श्री गंगाजी की धाराएं जिन शिवजी के पवित्र कंठ प्रदेश को प्रक्षालित (धोती) करती हैं, और जिनके गले में लंबे-लंबे बड़े-बड़े सर्पों की मालाएं लटक रही हैं तथा जो शिवजी डमरू को डम-डम बजाकर प्रचंड तांडव नृत्य करते हैं, वे शिवजी हमारा कल्याण करें।

Mandir Jo Karta Baris Ki Bhaviswani

हमारे भारतवर्ष में भगवान के चमत्कार और उनसे जुड़े रहस्यमय मंदिर का खजाना भरा हुआ है | आज में आपको एक और रहस्यमय मंदिर के बारे में बताने जा रहा हु जो की कानपुर शहर से करीब 45 किलोमीटर दूर घाटमपुर में स्थित है जिसके बारे के बारे में कहा जाता है की ये मंदिर आने वाले  मानसून की भविष्यवाणी करता है | अगर ग्रामीणों मने तो अगर मन्दिर के गुम्बद से पानी टपकने लगे तो समझ लो 15 दिन में मानसून आने वाला है, बताया जाता है कि यह मन्दिर देवी देवाताओं ने ऐसे समय पर बनवाया था जब प्रथ्वी पर प्रलय आने वाला था।

गोल गुम्बद की तरह लगता है यहाँ मंदिर 

जिस तरह  यह मन्दिर बना हुआ है उसे देखकर कोई भी यह कह सकता है, उसे देख कर यही लगता है की यह गोल गुम्बद है और यह किसी राजा का महल होगा । इस मंदिर के अनोखे नजारे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि किनारे और पीछे से देखने पर इसमें दो गुम्बद नजर आते हैं जबकि सामने से देखने पर एक ही गुम्बद नजर आता है या यह कह लिया जाए कि पूरा का पूरा मंदिर ही एक गुम्बद नजर आता है।

मंदिर के अन्दर लगा हुआ है चमत्कारी पत्थर

मंदिर के अन्दर भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्र एक शिलाखंड की प्रतिमा और उसके ठीक ऊपर छत पर लगे चमत्कारी पत्थर लगा हुआ है जिस के बारे में कहा जाता है की यह पत्थर मौसम की  भविष्यवाणी करता है | लोगों का कहना है कि हर साल इस मंदिर में लगे इस पत्थर से यह पानी की बूंदें तब टपकने लगती हैं जब मानसून आने वाला होता है।

शनि देव का प्रकोप किसी पर पड़ जाए तो उसका जीवन कष्‍टों से भर जाता है। व्‍यक्‍ति के अच्‍छे–बुरे कर्मों का फल शनि देव ही देते हैं। इसलिए जरूरी है कि आप शनिदेव को प्रसन्‍न रखें और भक्‍ति भाव से उनकी लगातार पूजा करते  करें। शनि देव का प्रकोप अत्‍यंत ही भयंकर परिणाम देता है। आज शनिवार के दिन हम आपको कुछ ऐसे उपाए बताते हे जिससे आप शनिदेव को प्रसन्‍न कर सकते हे  -:


1. शनिवार के दिन काली गाय की सेवा करें। उसके माथे पर रोली लगाकर सींगों में कलावा बांधें और धूप-दीप करें। इसके पश्‍चात् गाय की परिक्रमा करें और उसे बूंदी के चार लड्डू खिलाएं

2. सूर्यास्‍त के बाद हनुमान जी की आराधना करें और पूजन में सिंदूर, काले तिल के तेल का दीपक एवं नीले रंग के फूलों का प्रयोग करें।

आज में आपको जिस रहस्यमयी गुफा के बारे में बताने जा रहा हु, इस गुफा से ऎसी  मान्यताएं जु़डी हैं, जिनका उल्लेख पुराणों में भी किया गया है। गुफा के बारे में बताया जाता है कि इसमें दुनिया के समाप्त होने का भी रहस्य छुपा है। इस गुफा को पाताल भुवनेश्वर (patal bhuvneshwar) के नाम से जाना जाता है 

“शृण्यवन्तु मनयः सर्वे पापहरं नणाभ्‌ स्मराणत्‌ स्पर्च्चनादेव

पूजनात्‌ किं ब्रवीम्यहम्‌ सरयू रामयोर्मध्ये पातालभुवनेश्‍वर”

: –स्कन्द पुराण मानसखंड 103/10-11

व्यास जी ने कहा मैं ऐसे स्थान का वर्णन करता हूं, जिसका पूजन करने के सम्बन्ध में तो कहना ही क्या, स्मरण मात्र से ही सब पाप नष्ट हो जाते हैं। वह सरयू, रामगंगा के मध्य पाताल भुवनेश्वर है।

patal bhuvneshwarआज में  आपको एक ऎसी गुफा के बारे में बता रहा है जो उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में गंगोलीहाट कस्बे में स्थित है | उत्तराखण्ड के लगभग प्रत्येक गाँव का अपना देवता (कुलदेवता या ग्रामदेवता) होता है. मुख्यतः यह देवी देवता शिव, भगवती के रूप अथवा लोककथाओं से सम्बन्धित चरित्र होते हैं. यह क्षेत्र कई तरह के चमत्कारों से भरा हुआ है, जिन्हें देखकर सामान्य मनुष्य को परमपिता परमेश्वर की प्रभुसत्ता पर विश्वास करना ही पडता है आज में आपको जिस रहस्यमयी गुफा के बारे में बताने जा रहा हु, इस गुफा से ऎसी  मान्यताएं जु़डी हैं, जिनका उल्लेख पुराणों में भी किया गया है। गुफा के बारे में बताया जाता है कि इसमें दुनिया के समाप्त होने का भी रहस्य छुपा है। इस गुफा को पाताल भुवनेश्वर के नाम से जाना जाता है। पाताल भुवनेश्वर का दर्शन भी एक अदभुत अनुभव का मौका देता है. जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, यह स्थान पाताल अर्थात धरातल के नीचे स्थित है.  समुद्र तल से पातालभुवनेश्वर की उंचाई 1350 मीटर है

क्यों चढ़ाते हैं बजरंगबली को सिन्दूर?


हिन्दू धर्म में सिन्दूर के महत्त्व से भला कौन परिचित नहीं है ? एक विवाहित स्त्री के लिए सिन्दूर न केवल उसके विवाहित होने का प्रमाण है बल्कि एक प्रकार से गहना है । पूजा-पाठ में भी सिन्दूर की ख़ास एहमियत है । जहाँ अक्सर सभी देवी-देवताओं को सिन्दूर का तिलक लगाया जाता है, हनुमान जी को सिन्दूर का चोला चढ़ाया जाता है । इसके पीछे एक कारण है जिसका वर्णन रामचरितमानस में है ।

भक्तों दौरा हर प्रकार की पूजा और विधान से मां दुर्गा को प्रसन्न करने के जतन किए जाते है। लेकिन अगर आप व्यस्तताओं के चलते ‍विधिवत आराधना ना कर सकें तो मात्र 108 नाम के जाप करें इससे भी माता प्रसन्न होकर आशीर्वाद देती है। 
देवी दुर्गा के 108 नाम (108 names of Goddess Durga)

देवी दुर्गा के 108 नाम (108 names of Goddess Durga)


1. सती  : अग्नि में जल कर भी जीवित होने वाली
2. साध्वी : आशावादी
3. भवप्रीता : भगवान् शिव पर प्रीति रखने वाली
4. भवानी : ब्रह्मांड की निवास
5. भवमोचनी :  संसार बंधनों से मुक्त करने वाली
6. आर्या : देवी
7. दुर्गा :  अपराजेय
8. जया : विजयी
9. आद्य : शुरूआत की वास्तविकता
10. त्रिनेत्र : तीन आँखों वाली

महामृत्युंजय मंत्र” भगवान शिव द्वारा दिया सबसे बड़ा मंत्र माना जाता है। महामृत्युंजय मंत्र (mahamrityunjay mantra) एक  प्रभावशाली मंत्र है.इसे संजीवनी मंत्र भी कहते है.,ये नव जीवन देने वाला मंत्र है. इस मंत्र से मृत्यु तुल्य भी कष्ट भी कम होता है. 

महामृत्युंजय मंत्र (Mahamirtunjay mantra in hindi)


महामृत्युंजय मंत्र का जप आवश्यकता के अनुरूप होते हैं। अलग-अलग उद्देश्य के लिये अलग-अलग मंत्रों का प्रयोग होता है। मंत्र में दिए अक्षरों एवं उसकी संख्या के अनुरुप से उसके प्रभाग मे बदलाव आते है। यह मंत्र निम्न प्रकार से है-


एकाक्षरी मंत्र- हौं । (एक अक्षर का मंत्र)

त्र्यक्षरी मंत्र- ॐ जूं सः । (तीन अक्षर का मंत्र) 

चतुरक्षरी मंत्र- ॐ वं जूं सः। (चार अक्षर का मंत्र) 

किसी भी व्यक्ति की धन संबंधी मनोकामनाएं कब पूरी होंगी, कब महालक्ष्मी की कृपा मिलेगी, यह जानने के लिए ज्योतिष में कुछ संकेत बताए गए हैं। 

जानिए लक्ष्मी कृपा से जुड़े 15 शुभ संकेत 

1. यदि किसी व्यक्ति के सपनों में बार-बार पानी, हरियाली, लक्ष्मीजी का वाहन उल्लू दिखाई देने लगे तो समझ लेना चाहिए कि निकट भविष्य में लक्ष्मी कृपा से धन संबंधी बाधाएं दूर हो सकती हैं।
2. यदि हम किसी आवश्यक काम के लिए जा रहे हैं और रास्ते में लाल साड़ी में पूरे सोलह श्रृंगार किए कोई स्त्री दिख जाए तो यह भी महालक्ष्मी की कृपा का इशारा ही है। ऐसा होने पर उस दिन कार्यों में सफलता मिलने की संभावनाएं काफी अधिक रहती है।
3. सुबह उठते ही शंख, मंदिर की घंटियां आदि के स्वर सुनाई दे तो यह भी शुभ होता है।
4. किसी किसी व्यक्ति को सुबह-सुबह गन्ना दिखाई दे तो निकट भविष्य में उसे धन संबंधी कार्यों में सफलता प्राप्त हो सकती है।

कनकधारा यंत्र :

धन प्राप्ति के लिए हरसंभव श्रेष्ठ उपाय करना चाहते हैं। धन प्राप्ति और धन संचय के लिए पुराणों में वर्णित कनकधारा यंत्र एवं स्तोत्र चमत्कारिक रूप से लाभ प्रदान करते हैं। इस यंत्र की विशेषता भी यही है कि यह किसी भी प्रकार की विशेष माला, जाप, पूजन, विधि-विधान की माँग नहीं करता बल्कि सिर्फ दिन में एक बार इसको पढ़ना पर्याप्त है।

साथ ही प्रतिदिन इसके सामने दीपक और अगरबत्ती लगाना आवश्यक है। अगर किसी दिन यह भी भूल जाएँ तो बाधा नहीं आती क्योंकि यह सिद्ध मंत्र होने के कारण चैतन्य माना जाता है।
माँ लक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए जितने भी यंत्र हैं, उनमें कनकधारा यंत्र तथा स्तोत्र सबसे ज्यादा प्रभावशाली एवं अतिशीघ्र फलदायी है।    : अपार धन प्राप्ति और धन संचय के लिए कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने से लाभ प्राप्त होता है।

मंत्र जप नियम


मंत्र जप का मूल भाव होता है- मनन। जिस देव का मंत्र है उस देव के मनन के लिए सही तरीके धर्मग्रंथों में बताए है। शास्त्रों के मुताबिक मंत्रों का जप पूरी श्रद्धा और आस्था से करना चाहिए। साथ ही, एकाग्रता और मन का संयम मंत्रों के जप के लिए बहुत जरुरी है। माना जाता है कि इनके बिना मंत्रों की शक्ति कम हो जाती है और कामना पूर्ति या लक्ष्य प्राप्ति में उनका प्रभाव नहीं होता है। 

मंत्र जप  नियम


 १-मंत्रों का पूरा लाभ पाने के लिए जप के दौरान सही मुद्रा या आसन में बैठना भी बहुत जरूरी है। इसके लिए पद्मासन मंत्र जप के लिए श्रेष्ठ होता है। इसके बाद वीरासन और सिद्धासन या वज्रासन को प्रभावी माना जाता है। 

२-मंत्र जप के लिए सही वक्त भी बहुत जरूरी है। इसके लिए ब्रह्ममूर्हुत यानी तकरीबन 4 से 5 बजे या सूर्योदय से पहले का समय श्रेष्ठ माना जाता है। प्रदोष काल यानी दिन का ढलना और रात्रि के आगमन का समय भी मंत्र जप के लिए उचित माना गया है। 
३-अगर यह वक्त भी साध न पाएं तो सोने से पहले का समय भी चुना जा सकता है।
४-मंत्र जप प्रतिदिन नियत समय पर ही करें। 
५-एक बार मंत्र जप शुरु करने के बाद बार-बार स्थान न बदलें। एक स्थान नियत कर लें। 
६ -मंत्र जप में तुलसी, रुद्राक्ष, चंदन या स्फटिक की 108 दानों की माला का उपयोग करें। यह प्रभावकारी मानी गई है। 
७ -किसी विशेष जप के संकल्प लेने के बाद निरंतर उसी मंत्र का जप करना चाहिए। 
८-मंत्र जप के लिए कच्ची जमीन, लकड़ी की चौकी, सूती या चटाई अथवा चटाई के आसन पर बैठना श्रेष्ठ है। सिंथेटिक आसन पर बैठकर मंत्र जप से बचें।
९-मंत्र जप दिन में करें तो अपना मुंह पूर्व या उत्तर दिशा में रखें और अगर रात्रि में कर रहे हैं तो मुंह उत्तर दिशा में रखें। 
१०-मंत्र जप के लिए एकांत और शांत स्थान चुनें। जैसे- कोई मंदिर या घर का देवालय। 
११-मंत्रों का उच्चारण करते समय यथासंभव माला दूसरों को न दिखाएं। अपने सिर को भी कपड़े से ढंकना चाहिए। 
१२ -माला का घुमाने के लिए अंगूठे और बीच की उंगली का उपयोग करें।माला घुमाते समय माला के सुमेरू यानी सिर को पार नहीं करना चाहिए, जबकि माला पूरी होने पर फिर से सिर से आरंभ करना चाहिए।

माँ बगलामुखी की कथा


देवी बगलामुखी जी के संदर्भ में एक कथा बहुत प्रचलित है जिसके अनुसार एक बार सतयुग में महाविनाश उत्पन्न करने वाला ब्रह्मांडीय तूफान उत्पन्न हुआ, जिससे संपूर्ण विश्व नष्ट होने लगा इससे चारों ओर हाहाकार मच जाता है और अनेकों लोक संकट में पड़ गए और संसार की रक्षा करना असंभव हो गया. यह तूफान सब कुछ नष्ट भ्रष्ट करता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था, जिसे देख कर भगवान विष्णु जी चिंतित हो गए.



शनिदेव को तेल क्यों चढ़ाते हैं ?

शनिदेव को तेल उनकी पीड़ा दूर करने के लिए चढ़ाते है। जिससे शनिदेव प्रसन्न हो कर भक्तो की पीड़ा दूर करते है. 
 एक पौराणिक कथा के अनुसार लंका पर चढ़ाई के लिए समुद्र पर बांधे गए पुल की सुरक्षा का भार हनुमानजी को सौंपा गया था। हनुमानजी रात में भगवान राम का ध्यान करते हुए पुल की रक्षा कर रहे थे कि वहां शनिदेव आ पहुंचे और उन्हें व्यंग्यबाणों से परेशान करने लगे।  इसी बीच शनिदेव ने हनुमानजी को युद्ध के लिए ललकारा। इस पर हनुमान जी नेविनम्रतापूर्वक मना कर दिया। उन्होंने कहा कि कृपया वह उन्हें पुल की रक्षा करने दें, मेरी अराधना में विघ्न ना डालें। 
शनिदेव ने हनुमान जी को फिर ललकरते हुए कहा कि मैंने सुनाहै कि तुम बहुत बलवान हो, लेकिन मुझे देखते ही तुम्हारी ताकतकहां चली गई। या तो मुझसे युद्ध करो अन्यथा मेरे दास बनजाओ। इस पर हनुमानजी ने शनिदेव को अपनी पूंछ में फंसा लियाऔर घूमा-घूमा कर एक पर्वत से दूसरे पर्वत पर दे मारा। इससेशनिदेव का सारा शरीर छलनी हो गया। शरीर पर रगड़ के घावों सेत्रस्त शनिदेव ने हुनमान जी से उन्हें मुक्त करने की प्रार्थना की औरकहा कि आज से मैं आपकी हर बात मानूंगा। 


धार्मिक कार्यों में मौलि ( कलावा) क्यों बांधते हैं?

किसी भी शुभ कार्य से पहले जैसे कोई पूजा - अनुष्ठान , गृह प्रवेश ,दीपावली की पूजा या अन्य कोई भी पूजन 
सर्वप्रथम पंडित जी यजमान (यज्ञमान) को तिलक करते हैं और मौली बंधते हैं फिर पूजा आरम्भ होती है !  क्या आपको पता हे की मोली क्या बंधी जाती है 

मौली बंधते वक़्त इस मंत्र का उच्चारण जाता है:-येन बद्धो बलीराजा दावेंद्रो महाबलः !तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे माचलमाचल !!


हिन्दू धर्म  के १६ संस्कार (hindu dharma ke 16 sanskar)

सनातन अथवा हिन्दू धर्म की संस्कृति संस्कारों पर ही आधारित है। हमारे ऋषि-मुनियों ने मानव जीवन को पवित्र एवं मर्यादित बनाने के लिये संस्कारों का अविष्कार किया। धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक दृष्टि से भी इन संस्कारों का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। भारतीय संस्कृति की महानता में इन संस्कारों का महती योगदान है।

प्राचीन काल में हमारा प्रत्येक कार्य संस्कार से आरम्भ होता था। उस समय संस्कारों की संख्या भी लगभग चालीस थी। जैसे-जैसे समय बदलता गया तथा व्यस्तता बढती गई तो कुछ संस्कार स्वत: विलुप्त हो गये। इस प्रकार समयानुसार संशोधित होकर संस्कारों की संख्या निर्धारित होती गई। गौतम स्मृति में चालीस प्रकार के संस्कारों का उल्लेख है। महर्षि अंगिरा ने इनका अंतर्भाव पच्चीस संस्कारों में किया। व्यास स्मृति में सोलह संस्कारों का वर्णन हुआ है।

  हिन्दू धर्म  के १६ संस्कार ये निम्नानुसार हैं.... 

समुद्र शास्त्र के अनुसार किसी भी व्यक्ति के शरीर के विभिन्न अंगों को देखकर उसके बारे में काफी कुछ जाना जा सकता है। आज हम आपको बता रहे हैं कैसे कान वाले इंसान का नेचर कैसा होता है। कान मनुष्य की चौथी ज्ञान इंद्री है। इसका एक हिस्सा शरीर के बाहर दिखाई देता है, जबकि एक हिस्सा शरीर के अंदर होता है- छोटे कान- जिन लोगों के कान सामान्य से थोड़े छोटे आकार के होते हैं, ऐसे लोग बहुत बलशाली हो सकते हैं। ये विश्वसनीय भी होते हैं। साथ ही, ये कला के क्षेत्र में भी रुचि रखते हैं। यदि कोई इनसे कोई वस्तु मांग ले, तो ये उसे मना नहीं करते। बड़े कान- यदि किसी व्यक्ति के कान बड़े हों, तो वह विचारशील, कर्मठ, व्यवहारिक तथा समय का पाबंद होता है। इन्हे किसी भी काम में लेटलतीफी पसंद नहीं आती और ये सब काम व्यवस्थित तरीके से करने में विश्वास रखते हैं। चौड़े कान- समुद्र शास्त्र के अनुसार यदि किसी के कानों की चौड़ाई सामान्य से अधिक हो, तो ऐसे लोगों के पास सभी तरह की सुख-सुविधाएं होती हैं। ये अपने जीवन में हर सुख प्राप्त करते हैं। ऐसे लोग अवसरवादी भी होते हैं। सामान्य से अधिक छोटे कान- यदि किसी व्यक्ति के कान बहुत ही छोटे हों, तो ऐसे लोग स्वभाव से थोड़े चंचल हो सकते हैं। ये भगवान पर बहुत विश्वास करते हैं। कभी-कभी ऐसे लोग लालची भी हो जाते हैं और किसी के साथ धोखा करने से नहीं हिचकते। किसी से काम निकालना इन्हें बखूबी आता है। - जिस व्यक्ति के कान के बीच का भाग दबा हुआ हो, आमतौर पर वह अपराधी प्रवृत्ति का होता है।


भारतीय ज्योतिष बहुत ही विस्तृत है। हमारे ऋषि-मुनियों ने इसे अनेक भागों में बांटा है। भारतीय ज्योतिष का ही एक भाग है सामुद्रिक शास्त्र। इसके अंतर्गत किसी भी व्यक्ति के शरीर के अंगों, शरीर पर बने चिह्नों, चाल-ढाल या रहन-सहने के तरीके से आप उस व्यक्ति के चरित्र के बारे में कई गुप्त बातें जान सकते हैं। हमारे शरीर के हर अंग की बनावट व उसके स्वभाव के अलावा शरीर पर उपस्थित हर चिह्न का एक विशेष महत्व है। आज हम आपको शरीर के कुछ ऐसे ही अंगों व चिह्नों के बारे में तथा उनसे संबंधित मानवीय स्वभाव के बारे मे बता रहे हैं, जिन पर हम कभी ध्यान ही नहीं देते। स्त्री के मुख पर मूंछ के बाल समुद्र शास्त्र के अनुसार जिस स्त्री के मुख पर मूंछ के बाल स्पष्ट दिखाई देते हैं। वह स्त्री गरम मिजाज की होती है। ऐसी महिलाएं सिर्फ अपनी बात मनवाने वाली और पति पर हुक्म चलाने में माहिर होती हैं। कभी-कभी इनका स्वभाव बहुत क्रूर हो जाता है। अपनी बात मनवाने के लिए ये किसी भी हद तक जा सकती हैं। ऐसी स्त्रियां पूरे परिवार को अपने तरीके से चलाती हैं, कोई भी इनकी बात न मानें तो ये बहुत जल्दी गुस्सा भी हो जाती हैं।

समुद्र शास्त्र के अनुसार किसी भी व्यक्ति का चेहरा एक खुली किताब की तरह होता है, जिसके माध्यम से उसके व्यक्तित्व व स्वभाव के बारे में काफी कुछ आसानी से जाना जा सकता है। चेहरे का महत्वपूर्ण हिस्सा होते है होंठ। होंठ चेहरे को आकर्षक बनाते हैं। 

      जानिए, कैसे होंठ वाले व्यक्ति का स्वभाव कैसा होता है... 


1. संकुचित होंठ - ऐसे होंठ छोटे व पतले होते हैं, इनमें कोई रंग नहीं होता। जिन लोगों के होंठ ऐसे होते हैं, वे आमतौर पर दिखावा करने वाले होते हैं। ये सोचते हैं जो ये कर रहे हैं, वही ठीक है। ये थोड़ा कम बोलते हैं। इसलिए कई बार इन्हें घमंडी भी समझ लिया जाता है। 

2. मोटे होंठ - अधिक थुलथुले, मांस से भरपूर होंठ जो देखने में बदसूरत लगते हैं। जिन लोगों के होंठ ऐसे होते हैं वे क्रोधी स्वभाव के होते हैं। कभी-कभी ये बहुत भावुक भी हो जाते हैं। इनका स्वभाव थोड़ा जिद्दी होता है। 

3. रसिक होंठ - ऐसे होंठ लाल रंग के, चिकने व दिखने में कलात्मक होते हैं। जिन लोगों के होंठ ऐसे होते हैं, वे दिखने में सुंदर व आकर्षक होते हैं। इनके स्वभाव में अपनापन होता है। ये अपने जीवन में हर सुख प्राप्त करते हैं। इन्हें अपने जीवन में कई उपधब्धियां भी मिलती हैं।

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