Jyotish Se samadhan

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 पूजा में कुश का उपयोग क्यों होता है ( Why should we use kusa in puja )

हिंदू धर्म में किए जाने वाले धार्मिक कर्म-कांडों में विशेष अवसरों पर कुश ( एक विशेष प्रकार की घास) का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा कोई भी जप कुश के आसन पर बैठकर करने का ही विधान है। पर क्या आपको पता है कुश  का उपयोग पूजा क्यों किया जाता है |

धार्मिक कारण

हम  पूजा पाठ,जप,यज्ञ आदि में बैठने के लिए कुश का इस्तेमाल करते हैं !कुश की अंगुठी बनाकर अनामिका उंगली मे पहनने का विधान है, ताकि हाथ में संचित आध्यात्मिक शक्ति पुंज दूसरी उंगलियों में न जाए, क्योंकि अनामिका के मूल में सूर्य का स्थान होने के कारण यह सूर्य की उंगली है। सूर्य से हमें जीवनी शक्ति, तेज और यश मिलता है। दूसरा कारण इस ऊर्जा को पृथ्वी में जाने से रोकता है।

सर्व कष्ट निवारण मंत्र  बगलामलामन्त्र

माँ बगला का यह मला मंत्र काफी लाभदयक है, इस मंत्र को सर्व कष्ट निवारण मंत्र भी कहा जाता है |
आप इस मंत्र का जप समस्त बाधाओं को दूर करने के लिए, आपत्ति में, भय निवारण के लिए, ऊपरी दोष दूर करने के लिए ,रोग निवारण के लिए कर सकते है |

Mantra In Hindi 

ॐ नमो भगवती ॐ नमो वीर प्रताप विजय भगवति बगलामुखि मम सर्व निन्दकानां सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय-स्तम्भय ब्राह्मीं मुद्रय-मुद्रय, बुद्धिं विनाशय-विनाशय, अपरबुद्धिं कुरू-कुरू, आत्मविरोधिनां शत्रुणां शिरो-ललाट-मुख-नेत्र-कर्ण-नासिकोरू-पद-अणुरेशु-दन्तोष्ठ-जिह्वां-तालु- गुह्य-गुद-कटि-जानू-सर्वांगेषु-

शिव ताण्डव स्तोत्र (संस्कृत:शिवताण्डवस्तोत्रम्) महान विद्वान एवं परम शिवभक्त लंकाधिपति रावण द्वारा विरचित भगवान शिव का स्तोत्र है।
SHIV TANDAV STOTRA


कथा
मान्यता है कि रावण ने कैलाश पर्वत ही उठा लिया था और जब पूरे पर्वत को ही लंका ले चलने को उद्यत हुआ उस समय अपनी शक्ति पर पूर्ण अहंकार भाव में था | भोलेबाबा को उसका यह अहं पसंद नही आया तो भोले बाबा ने अपने अंगूठे से तनिक सा जो दबाया तो कैलाश फिर जहां था वहीं अवस्थित हो गया। शिव के अनन्य भक्त रावण का हाथ दब गया और वह आर्तनाद कर उठा - "शंकर शंकर" - अर्थात क्षमा करिए, क्षमा करिए और स्तुति करने लग गया; जो कालांतर में  शिव तांडव स्त्रोत्र कहलाया।
इस स्त्रोत की भाषा अनुपम और जटिल है , पर महाविद्वान रावण में इसे कुछ पलो में ही बना दिया था | शिव स्तुति और प्रसन्नता में यह स्त्रोत राम बाण है |

काव्य शैली
शिवताण्डव स्तोत्र स्तोत्रकाव्य में अत्यन्त लोकप्रिय है। यह पञ्चचामर छन्द में आबद्ध है। इसकी अनुप्रास और समास बहुल भाषा संगीतमय ध्वनि और प्रवाह के कारण शिवभक्तों में प्रचलित है। सुन्दर भाषा एवं काव्य-शैली के कारण यह स्तोत्रों विशेषकर शिवस्तोत्रों में विशिष्ट स्थान रखता है। 
कहते हैं इस स्‍तोत्र को सुनने मात्र से सकल समृद्धि, सिद्धि और संतति का वरदान प्राप्‍त हो जाता है। मूल संस्‍कृत भाषा में लिखे इस स्‍तोत्र को आइए हिन्‍दी भाषा में समझते हैं।
शिव तांडव स्‍त्रोत

जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डमनिनादवड्डमर्वयं
चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥1॥

सघन जटामंडल रूप वन से प्रवाहित होकर श्री गंगाजी की धाराएं जिन शिवजी के पवित्र कंठ प्रदेश को प्रक्षालित (धोती) करती हैं, और जिनके गले में लंबे-लंबे बड़े-बड़े सर्पों की मालाएं लटक रही हैं तथा जो शिवजी डमरू को डम-डम बजाकर प्रचंड तांडव नृत्य करते हैं, वे शिवजी हमारा कल्याण करें।

Mandir Jo Karta Baris Ki Bhaviswani

हमारे भारतवर्ष में भगवान के चमत्कार और उनसे जुड़े रहस्यमय मंदिर का खजाना भरा हुआ है | आज में आपको एक और रहस्यमय मंदिर के बारे में बताने जा रहा हु जो की कानपुर शहर से करीब 45 किलोमीटर दूर घाटमपुर में स्थित है जिसके बारे के बारे में कहा जाता है की ये मंदिर आने वाले  मानसून की भविष्यवाणी करता है | अगर ग्रामीणों मने तो अगर मन्दिर के गुम्बद से पानी टपकने लगे तो समझ लो 15 दिन में मानसून आने वाला है, बताया जाता है कि यह मन्दिर देवी देवाताओं ने ऐसे समय पर बनवाया था जब प्रथ्वी पर प्रलय आने वाला था।

गोल गुम्बद की तरह लगता है यहाँ मंदिर 

जिस तरह  यह मन्दिर बना हुआ है उसे देखकर कोई भी यह कह सकता है, उसे देख कर यही लगता है की यह गोल गुम्बद है और यह किसी राजा का महल होगा । इस मंदिर के अनोखे नजारे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि किनारे और पीछे से देखने पर इसमें दो गुम्बद नजर आते हैं जबकि सामने से देखने पर एक ही गुम्बद नजर आता है या यह कह लिया जाए कि पूरा का पूरा मंदिर ही एक गुम्बद नजर आता है।

मंदिर के अन्दर लगा हुआ है चमत्कारी पत्थर

मंदिर के अन्दर भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्र एक शिलाखंड की प्रतिमा और उसके ठीक ऊपर छत पर लगे चमत्कारी पत्थर लगा हुआ है जिस के बारे में कहा जाता है की यह पत्थर मौसम की  भविष्यवाणी करता है | लोगों का कहना है कि हर साल इस मंदिर में लगे इस पत्थर से यह पानी की बूंदें तब टपकने लगती हैं जब मानसून आने वाला होता है।

शनि देव का प्रकोप किसी पर पड़ जाए तो उसका जीवन कष्‍टों से भर जाता है। व्‍यक्‍ति के अच्‍छे–बुरे कर्मों का फल शनि देव ही देते हैं। इसलिए जरूरी है कि आप शनिदेव को प्रसन्‍न रखें और भक्‍ति भाव से उनकी लगातार पूजा करते  करें। शनि देव का प्रकोप अत्‍यंत ही भयंकर परिणाम देता है। आज शनिवार के दिन हम आपको कुछ ऐसे उपाए बताते हे जिससे आप शनिदेव को प्रसन्‍न कर सकते हे  -:


1. शनिवार के दिन काली गाय की सेवा करें। उसके माथे पर रोली लगाकर सींगों में कलावा बांधें और धूप-दीप करें। इसके पश्‍चात् गाय की परिक्रमा करें और उसे बूंदी के चार लड्डू खिलाएं

2. सूर्यास्‍त के बाद हनुमान जी की आराधना करें और पूजन में सिंदूर, काले तिल के तेल का दीपक एवं नीले रंग के फूलों का प्रयोग करें।

आज में आपको जिस रहस्यमयी गुफा के बारे में बताने जा रहा हु, इस गुफा से ऎसी  मान्यताएं जु़डी हैं, जिनका उल्लेख पुराणों में भी किया गया है। गुफा के बारे में बताया जाता है कि इसमें दुनिया के समाप्त होने का भी रहस्य छुपा है। इस गुफा को पाताल भुवनेश्वर (patal bhuvneshwar) के नाम से जाना जाता है 

“शृण्यवन्तु मनयः सर्वे पापहरं नणाभ्‌ स्मराणत्‌ स्पर्च्चनादेव

पूजनात्‌ किं ब्रवीम्यहम्‌ सरयू रामयोर्मध्ये पातालभुवनेश्‍वर”

: –स्कन्द पुराण मानसखंड 103/10-11

व्यास जी ने कहा मैं ऐसे स्थान का वर्णन करता हूं, जिसका पूजन करने के सम्बन्ध में तो कहना ही क्या, स्मरण मात्र से ही सब पाप नष्ट हो जाते हैं। वह सरयू, रामगंगा के मध्य पाताल भुवनेश्वर है।

patal bhuvneshwarआज में  आपको एक ऎसी गुफा के बारे में बता रहा है जो उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में गंगोलीहाट कस्बे में स्थित है | उत्तराखण्ड के लगभग प्रत्येक गाँव का अपना देवता (कुलदेवता या ग्रामदेवता) होता है. मुख्यतः यह देवी देवता शिव, भगवती के रूप अथवा लोककथाओं से सम्बन्धित चरित्र होते हैं. यह क्षेत्र कई तरह के चमत्कारों से भरा हुआ है, जिन्हें देखकर सामान्य मनुष्य को परमपिता परमेश्वर की प्रभुसत्ता पर विश्वास करना ही पडता है आज में आपको जिस रहस्यमयी गुफा के बारे में बताने जा रहा हु, इस गुफा से ऎसी  मान्यताएं जु़डी हैं, जिनका उल्लेख पुराणों में भी किया गया है। गुफा के बारे में बताया जाता है कि इसमें दुनिया के समाप्त होने का भी रहस्य छुपा है। इस गुफा को पाताल भुवनेश्वर के नाम से जाना जाता है। पाताल भुवनेश्वर का दर्शन भी एक अदभुत अनुभव का मौका देता है. जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, यह स्थान पाताल अर्थात धरातल के नीचे स्थित है.  समुद्र तल से पातालभुवनेश्वर की उंचाई 1350 मीटर है

क्यों चढ़ाते हैं बजरंगबली को सिन्दूर?


हिन्दू धर्म में सिन्दूर के महत्त्व से भला कौन परिचित नहीं है ? एक विवाहित स्त्री के लिए सिन्दूर न केवल उसके विवाहित होने का प्रमाण है बल्कि एक प्रकार से गहना है । पूजा-पाठ में भी सिन्दूर की ख़ास एहमियत है । जहाँ अक्सर सभी देवी-देवताओं को सिन्दूर का तिलक लगाया जाता है, हनुमान जी को सिन्दूर का चोला चढ़ाया जाता है । इसके पीछे एक कारण है जिसका वर्णन रामचरितमानस में है ।

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